टूटे पत्थरों से अटूट आस्था तक : सोमनाथ की गाथा
- ब्रिजेश सिंह, महासंचालक एवं प्रधान सचिव (DGIPR)
भारत को स्वतंत्रता मिलने के तुरंत बाद, 13 नवंबर 1947 को तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री और उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल सोमनाथ पहुंचे। समुद्र तट पर खड़े होकर उन्होंने मंदिर के खंडहरों को गंभीरता से देखा और एक संकल्प लिया—सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का। वह क्षण भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का पहला महान उदय था, सभ्यतागत आत्मसम्मान की सार्वजनिक पुनर्प्राप्ति का क्षण।
और अब, 11 मई को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमनाथ अमृत महोत्सव में मंदिर की पुनर्स्थापित दिव्यता के बीच भाग लिया, तो वही संकल्प एक बार फिर प्रज्ज्वलित होता दिखाई दिया। विशेष महापूजा, कुंभाभिषेक, ध्वजारोहण और जनसमूह की विराट उपस्थिति—ये सब मिलकर विनाश से पुनर्निर्माण और पुनर्जागरण तक की एक अखंड यात्रा की घोषणा करते हैं। यह यात्रा सरदार पटेल के स्वप्न से आज के आत्मविश्वास से भरे भारत तक फैली एक सतत सभ्यतागत धारा है। यह विरासत प्रत्येक पीढ़ी को अपने सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करने, एकता को सहेजने और भारत की सनातन आत्मा में अटूट विश्वास के साथ समृद्ध, सौहार्दपूर्ण और अखंड भविष्य की ओर बढ़ने का आह्वान करती है।
अमेरिकी लेखक मार्क टेन ने प्रसिद्ध रूप से कहा था कि वाराणसी इतिहास, परंपरा और किंवदंतियों से भी प्राचीन है। लेकिन शायद उन्होंने प्रभास पाटन और सोमनाथ नहीं देखा था। भागवत पुराण के अनुसार, चंद्रदेव को उनके ससुर दक्ष ने श्राप दिया था। उस श्राप से मुक्ति पाने के लिए चंद्र ने इसी स्थल पर भगवान शिव की आराधना की, और इसी कारण यह स्थान ‘सोमनाथ—अर्थात चंद्र के स्वामी’—के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
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